केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड
अनुसंधान और विकास अध्ययन
जल संसाधन मंत्रालय के अनुसंधान एवं विकास कार्यक्रम:
जल संसाधन मंत्रालय जल संसाधन इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अनुसंधान कार्य को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करता है। यह सहायता विश्वविद्यालयों में शिक्षाविदों/ विशेषज्ञों, आईआईटी, मान्यता प्राप्त अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशालाओं, केन्द्रीय और राज्य सरकारों और गैर सरकारी संगठनों के जल संसाधन/ सिंचाई विभागों के लिए अनुदान के माध्यम से प्रदान की जाती है । जल संसाधन मंत्रालय के समर्थन के लिए मौलिक अनुसंधान के साथ-साथ अनुप्रयुक्त अनुसंधान प्रस्तावों पर विचार किया जाता है ।
भूजल संबंधी भारतीय राष्ट्रीय समिति (आईएनसीजीडब्ल्यू)
भू जल संबंधी भारतीय राष्ट्रीय समिति (आईएनसीजीडब्ल्यू) का गठन जल संसाधन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा भूजल क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास कार्यक्रमों में तेजी लाने के लिए और भूजल के क्षेत्र में अनुसंधान की बढ़ती आवश्यकता को ध्यान में रखकर किया गया है । अध्यक्ष, केन्द्रीय भूजल बोर्ड आईएनसीजीडब्ल्यू के अध्यक्ष है। भू - जल के क्षेत्र में 15 प्रख्यात विशेषज्ञ इस समिति के सदस्य है।
समिति को निम्नलिखित कार्यों का दायित्व सौंपा गया है -
- भूजल से संबंधित मामलों पर केन्द्र और राज्य सरकारों और उनकी एजेंसियों को सलाह देना, विशेष समस्याओं पर विचार के लिए समिति को सलाह देने के उद्देश्य से विशेषज्ञ पैनल की नियुक्ति ।
- देश में भूजल की विभिन्न शाखाओं में समय-समय पर उन्नति को अद्यतन करना, पत्रिकाओं, अनुसंधान समाचार / सार संग्रह के माध्यम से भूजल से संबंधित जानकारी का प्रसार, सेमिनारों / सम्मेलन कार्यशालाओं जैसे जनजागरूकता कार्यक्रमों का संचालन और समर्थन एवं भूजल के लिए अनुसंधान एवं विकास समीक्षा सत्र की व्यवस्था करना ।
- भूजल के विकास के ऐतिहासिक सराहना पर अध्ययन करना और भूजल क्षेत्र में अनुसंधान के लिए परिप्रेक्ष्य योजना तैयार करना ।
- भूजल अनुसंधान संस्थानों के बुनियादी ढांचे के विकास के लिए वित्तीय अनुशंसा करना, भूजल क्षेत्र में उत्कृष्टता के केंद्रों की मान्यता की सिफारिश, अन्य राष्ट्रीय समितियों / बोर्ड, भारत सरकार / राज्य मंत्रालयों, सीएसआईआर प्रयोगशाला, आईआईटी, इंजीनियरिंग कॉलेजों और पॉलीटेक्निक विश्वविद्यालयों और अन्य शैक्षिक संस्थानों के साथ सहभागिता बनाए रखना ।
- सामान्य रूप में भूजल अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों का समन्वय और विशेष रूप से जल संसाधन मंत्रालय की अनुसंधान एवं विकास कार्यक्रम का समन्वय, अनुसंधान योजनाओं को क्रियान्वित करने पर संस्थाओं द्वारा की गई प्रगति पर नजर रखना, ऐसे क्षेत्रों की पहचान करना जहां तत्काल ध्यान देने की जरूरत है, विभिन्न संस्थानों के अनुसंधान कार्यक्रम में अतिव्याप्ति न होने देना, ऐसे क्षेत्रों में जहां किया जा रहा कार्य अपर्याप्त है, में अनुसंधान और विकास के प्रस्तावों को प्रोत्साहित करना, राष्ट्रीय संस्थाओं, स्वैच्छिक, वृतिकों, निकायों और गैर वाणिज्यिक गैर सरकारी संगठन को भूजल क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास के लिए प्रोत्साहित करना ।
- अनुसंधान स्टाफ की विशेषज्ञता के लिए अग्रणी मानव संसाधन विकास कार्यक्रमों को बढ़ावा देना और उत्कृष्ट अनुसंधान कर्मियों के लिए प्रोत्साहन की सिफारिश करना ।
- भूजल से संबंधित अर्न्तराष्ट्रीय कार्यक्रमों में भारत की प्रभावी भागीदारी को बढ़ावा देना तथा समन्वय करना एवं ऐसे अर्न्तराष्ट्रीय निकायों के लिए राष्ट्रीय समिति के रूप में कार्य करना ।
- भूजल क्षेत्र में जहां आवश्यक हो, ऋण के माध्यम से स्वदेशी उद्योग को भूजल के प्रौद्योगिकी विकास के प्रोत्साहित करना ।
विषय डोमेन:
- भूजल पुनर्भरण
- भूजल गुणवत्ता
- जलवायु परिवर्तन
- भूजल सतही जल अन्तर संबंध
- भूजल प्रबंधन
- जीआईएस और दूर संवेदी
- भूभौतिकीय अन्वेषण
- गणितीय/ अनुकार मॉडलिंग
अनुसंधान श्रेणियाँ
अनुसंधान और संबंधित गतिविधियों के लिए जल संसाधन मंत्रालय से सहायता अनुदान की मांग हेतु निम्नलिखित सूची से एक या अधिक घटक होने चाहिएं ।
- मौलिक अनुसंधान
- प्रायोगिक अनुसंधान
- कार्रवाई अनुसंधान
- शिक्षा और प्रशिक्षण
- जल संसाधन विकास पर जन जागरूकता
- बुनियादी सुविधाओं का विकास
- उत्कृष्टता के केन्द्रों का निर्माण
किसे वित्त पोषित किया जा सकता है
अनुदान निम्नलिखित को उपलब्ध कराया जाता है:
- केन्द्रीय या राज्य सरकार की अनुसंधान एवं विकास संस्थानों / प्रयोगशालाओं को ।
- जल संसाधन मंत्रालय के तहत संगठनों को ।
- विश्वविद्यालयों और शैक्षिक संस्थानों, इंजीनियरिंग और कृषि महाविद्यालयों, आईआईटी को ।
- वाल्मीस, गैर सरकारी संगठनों, गैर लाभ वाले निजी अनुसंधान एवं विकास संस्थानों / संगठनों को ।
आवेदन प्रक्रिया
अनुसंधान अनुदान के लिए आवेदन करने के लिए जल संसाधन मंत्रालय के दिशा निर्देशों में निर्धारित प्रोफार्मा पर प्रोफार्मा पर आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है । प्रस्ताव की पांच प्रतियां नीचे दिए गए पते पर सदस्य सचिव, आईएनसीजीडब्ल्यू को प्रस्तुत किया जाना चाहिए:
सदस्य सचिव, आईएनसीजीडब्ल्यू
केंद्रीय भूमिजल बोर्ड
गैलरी नं 18/11, जाम नगर हाउस
मानसिंह रोड, नई दिल्ली - 110011
अनुसंधान अनुदान आवेदन प्रपत्र और विस्तरित दिशा - निर्देश के लिए ( यहाँ क्लिक करें)
अनुसंधान स्टाफ के वेतन की दरों के लिए (यहाँ क्लिक करें)
ऐसे प्रस्ताव जो किसी भी नई तकनीक के अनुसंधान से संबंधित नहीं हैं, जो डेटा संग्रहण और डेटा के अभिज्ञात तकनीक उपयोग से संबंधित है, साइट विशिष्ट प्रस्तावों, जो प्रयोगशाला अध्ययन तक ही सीमित हैं और जिनमें क्षेत्र परीक्षण के लिए योजना शामिल नहीं की गई है, ऐसे प्रस्ताव जहां नई तकनीक के अंतिम उपयोगकर्ता की स्पष्ट रूप से पहचान नहीं होती है कम प्राथमिकता दी जाएगी.
भूजल डोमेन में अनुसंधान की प्राथमिकता वाले क्षेत्र
- भूजल गुणवत्ता प्रक्रिया, संदूषण, रोकथाम एवं उपचार
- असंतृप्त क्षेत्र में और संतृप्त क्षेत्र में भौतिक, रासायनिक और जैविक प्रक्रियाएं ।
- जल की गुणवत्ता में गिरावट से जलभृतों का संरक्षण, प्रदूषण को रोकने, और ऐसे क्षेत्रों में जहां इसमें गिरावट आई है में गुणवत्ता का उपचार करना ।
- विभिन्न गुणवत्ता वाले जल के जलभृतों का प्रबंधन ।
- जैवजनिक रसायनों की सक्रियता पर विशिष्ट महत्व सहित शैल भूजल अन्तरसंबंध
- भूजल में राडोण और इससे स्वास्थ्य / प्राकृतिक खतरा ।
- जलवायु परिवर्तन और भूजल प्रभाव और अनुकूल। संभावित भूजल भण्डार और अभयारण्य कुएं ।
- भूजल- सतही जल- खारा पानी
- तटीय उथले जलभृतों, सतही जल और प्रथम सीमित जलभृत के बीच संबंद्ध ।
- भूमि और सतह जल से संदूषक और अपशिष्ट निर्वहन का उथले जलभृत और इसकी विपरीत स्थिति में स्थानांतरण के बीच संबंध ।
- तटीय और अंतर्देशीय क्षेत्रों में खारा और पेय भूजल इंटरफ़ेस.
- - भूजल प्रवाह पुनर्भरण और स्त्राव तंत्र, विभिन्न भूवैज्ञानिक/ जलवायु संरचना में परिमाणन एवं प्रबंधन
- भूजल प्रवाह और संदूषक परिवहन तंत्र. आइसोटोप तकनीकों के अनुप्रयोग
- जलभृत ज्यामिति और सटीक स्टोराटीविटी के मूल्यांकन का चित्रण और जलभृत की उपज
- तटीय क्षेत्रों में खारा पानी अन्त:प्रवेश की जांच करने के लिए अन्त:क्षेपण कुओं के माध्यम से उपचारित अपशिष्ट को वापस पंप करना ।
- पारिस्थितिकी भूजलविज्ञान
- खारा भूजल जलाशय में कार्बन प्रच्छादन और उसके प्रभाव
पूरी हो चुकी परियोजनाएं
क्र.सं. |
योजना का शीर्षक |
पीआई के और संस्थान का नाम |
स्थिति |
1. |
2. |
3. |
|
1. |
पश्चिमी हिमालय में वसंत निर्वहन की वृद्धि के लिए |
डॉ. जी.सी.एस.नेगी, हिमालय पर्यावरण एवं विकास, जीपी पंत संस्थान कोसी कटारमल, अल्मोड़ा |
पूरी कर ली गई है। |
2. |
डाटा बेस तैयार करने और भूजल पुनर्भरण क्षमता के मूल्यांकन और नदी भूआकृति विज्ञान के लिए राजस्थान के खारी माशी जल निकासी बेसिन, का अध्ययन. |
डॉ. एस सिन्हा रे, बिरला इंस्टिट्यूट ऑफ साइंटिफिक रिसर्च, स्टैचू सर्किल, जयपुर - 302,001, राजस्थान |
पूरी कर ली गई है। |
3. |
मुजफ्फरनगर जिला, उत्तर प्रदेश के यमुना कृष्णा उपबेसिन में भूजल प्रवाह मॉडलिंग एवं जलभृत संवेदनशीलता मूल्यांकन अध्ययन |
डॉ. राशिद उमर, भूविज्ञान विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय. |
पूरी कर ली गई है। |
4. |
भारत में भूजल के उपयोग को विनियमित करने के लिए संस्थागत ढांचा |
प्रो कामता प्रसाद, अध्यक्ष, इंस्टीटयूट फॉर रिसार्स मैनेजमेंट एंड इकनोमिक डवलैपमेंट , 2 बी, इंस्टीट्यूशनल एरिया, कड़कड़डूमा, दिल्ली - 110 092. |
पूरी कर ली गई है। |
5. |
जैब उपचार के उपयोग से सीआर (VI) संदूषित जलभृतों की सफाई हेतु मॉडल का विकास |
डॉ. लिगे फिलिप, एसोसिएट प्रोफेसर, सिविल इंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी मद्रास, चेन्नई – 600036. |
पूरी कर ली गई है। |
पूरी हो चुकी परियोजनाओं का सार
- पश्चिमी हिमालय में वसंत निर्वहन की वृद्धि के लिए भूजलवैज्ञानिक अध्ययन - डॉ. जी.सी.एस.नेगी, हिमालय पर्यावरण एवं विकास, जीपी पंत संस्थान कोसी कटारमल, अल्मोड़ा
अध्येता ने पश्चिमी हिमालच (उत्तराखंड में ) मध्य ऊंचाई बेल्ट (निचले हिमालय) में 5 चुनिंदा झरनों की जल उत्पादकता एवं गुणवत्ता पर झरना पुनर्भरण क्षेत्र में वर्षा, भूआकृति विज्ञान, अश्म विज्ञान, ढ़लान एवं पहलू, भूमि उपयोग पद्धति, वनस्पति, ऊंचाई, मृदा के प्रकार तथा मानवजनित हस्ताक्षेपें (अर्थात सड़क निर्माण तथा स्थापन आदि) के प्रभाव को समझने का प्रयास किया है । इस बेल्ट में अधिकांश मानव स्थापना हो चुकी है तथा झरनों के जल का संवर्धन अत्यंत आवश्यक है । इस अनुसंधान द्वारा झरनों में निस्सरण एवं जल संवर्धन के लिए पुनर्भरण क्षेत्र विशिष्टताओं को आदर्श माना जाता है ।
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- भारत में भूजल के उपयोग को विनियमित करने के लिए संस्थागत ढांचा
क्षमता मूल्यांकन - प्रो कामता प्रसाद, अध्यक्ष, इंस्टीटयूट फॉर रिसार्स मैनेजमेंट एंड इकनोमिक डवलैपमेंट , 2 बी, इंस्टीट्यूशनल एरिया, कड़कड़डूमा, दिल्ली - 110 092.
इस अध्ययन में अध्येता ने अति दोहित गंभीर एवं अर्द्धगंभीर क्षेत्रों में भूजल के उपयोग के विनियमन के लिए मौजूदा संस्थागत ढांचे की पर्याप्ता की जांच करने का प्रयास किया है । उन्होंने समाज के कमजोर वर्गों के लिए साम्य के आधार पर भूजल प्राप्ति की दिशा में भूजल विनियमन प्रणाली की प्रभावकारिता का मूल्यांकन किया है । लेखक ने 6 चुनिंदा राज्यों नामत: आंध्रप्रदेश, दिल्ली,गुजरात,पंजाब, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में गहन अध्ययन किया । प्रत्येक राज्य से एक जिला (दिल्ली में 2 जिले) चुना गया । प्रत्येक जिले से 2 ब्लॉक (दिल्ली में एक ब्लॉक) तथा प्रत्येक ब्लॉक से 3 गॉंव और एक छोटे शहर को चुना गया । प्रत्येक नमूना गॉंव से 10 भूजल उपयोक्ता घर तथा प्रत्येक शहर से 15 भूजल उपयोक्ता घर (उपलब्धता के आधार पर) अध्ययन के लिए चुने गए। अध्ययन की सूचना जमीनी स्तर पर फील्ड सर्वेक्षण के माध्यम से प्राथमिक स्रोत पर अधिक निर्भरता रखते हुए प्राथमिक एवं माध्यमिक स्रातों से संग्रहित की गई । इन अध्ययन का यह सुझाव है कि गिरते भूजल स्तर जैसे जटिल मामले के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है । अध्ययन द्वारा कई कार्रवाई बिन्दुओं का सुझाव दिया गया है :
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- यमुना-कृष्णा उप बेसिन, मुजफफरनगर जिला, उत्तर प्रदेश में भूजल प्रभाव मॉडलिंग एवं जलभृत संवेदन शीलता का आकलन अध्ययन- डॉ. राश्दि उमर, भूविज्ञान विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विद्यालय ।
इस अध्ययन का उद्देश्य यमुना कृष्णा उपबेसिन में प्रवाह प्रणाली की प्राकृतिक स्थिति के अंतर्गत जलभृत के जल संतुलन के विकास एवं सुधार तथा संदूषक संवेदनशील जलभृत क्षेत्र की पहचान करने और इसके उपशमन हेतु व्यवहार्यता अध्ययन करना है । इस अध्ययन द्वारा क्षेत्र की भूजल स्थिति की विस्तृत जानकारी निश्चितता के साथ प्रस्तुत की गई है । अध्येता का सुझाव है कि यमुना कृष्णा उपबेसिन में भूजल संसाधनों के प्रबंधन के लिए भूजल संरचनाओं पर सख्त नियंत्रण रखने की आवश्यकता है । अध्येता ने नियंत्रित संरचना, कृत्रिम पुनर्भरण, गहरे जलभृतों का विकास, भूजल कानून, संयुक्त उपयोग आदि का सुझाव दिया है ।
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- जैब उपचार के प्रयोग से सीआर (VI) संदूषित जलभृतों की सफाई हेतु मॉडल का विकास- डॉ. लिगे फिलिप, एसोसिएट प्रोफेसर, सिविल इंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी मद्रास, चेन्नई – 600036
इस अध्ययन के द्वारा जैब अवरोधों और प्रतिक्रियाशील क्षेत्रों सहित बैच प्रयोगों, बैंच स्केल कॉलम अध्ययन, प्रायोगिक स्केल अध्ययन के माध्यम से जलभृतों में हेम्सावेंलेंट क्रोमियम के परिवहन एवं जैब रूपांतरण को समझने का प्रयास किया गया है । बैच प्रयोग से प्राप्त डेटा को गुण और जीवाणु की उपस्थिति सीआर (VI) से सीआर (III) के जैब रूपांतरण के दौरान सीआर (VI) अल्पीकरण, सबस्ट्रेट खपत एवं जीवाणु वृद्धि की प्रक्रिया का अनुकरण करने के लिए एक गणितीय मॉडल प्रस्तावित करने के लिए उपयोग में लाया गया । इस मॉडल का विकास न केवल क्रोमिकयम अल्पीकरण जीवाणु (सीआरबी) द्वारा जैव रूपांतरण मात्र के लिए किया गया बल्कि गड़, लौह एवं सल्फेट की उपस्थिति में सीआरबी, लौह अल्पीकरण जीवाणु (आईआरबी) और सल्फेट अल्पीकरण जीवाणु (एसआरबी) द्वारा सीआर (VI) से सीआर (III) के जैब रूपांतरण के लिए भी किया गया । गणितीय मॉडल को प्रायोगिक स्केल प्रयोग अध्ययन द्वारा मान्यता दी गई । यह प्रदर्शन किया गया कि जैब बैरियर्स के इष्टतम डिजाइन के लिए प्रस्तावित गणितीय मॉडल कैसे अनुकार अनूकलन ढांचे में इष्टतम मॉडल से जोड़ेजा सकते हैं । गणितीय मॉडलों को संदूषिज जलभृतों के उपचार हेतु प्रतिक्रिया क्षेत्र प्रौद्योगिकी की व्यवहार्यता अध्ययन के लिए भी प्रयोग में लाया गया ।
( विस्तृत रिपोर्ट के लिए यहाँ क्लिक करें)
- डाटा बेस तैयार करने के लिए और भूजल पुनर्भरण क्षमता के मूल्यांकन के लिए राजस्थान के खारी माशी जल निकासी बेसिन के विवर्तनिकी और नदी भू आकृति विज्ञान का अध्ययन- पीआई- डॉ. एस.पी. सिन्हा रे, बिरला इंस्टीटयूट ऑफ साइंटिफिक रिसर्च, स्टैचू सर्कल, जयपुर (राजस्थान)
खारी माशी जल निकासी बेसिन में नदी संबंधी प्रक्रियाओं की भूमिका एवं उनकी संभावित योगदान को समझने के उद्देश्य से अध्येता द्वारा विभिन्न भूआकृति इकाईयों एवं धारा नेटवर्क विशेषताओं में इनकी प्रक्रिया का अध्ययन करने का एक प्रयास किया गया है । यह अध्ययन बेसिन में भूजल पुनर्भरण संभाव्यता एवं उपयुक्त पुनर्भरण क्षेत्र के रेखांकन के आकलन से संबंधित है । लेखक ने सबसे अनुकूल एवं संभाव्य भूजल पुनर्भरण क्षेत्र की पहचान करने के लिए दो दृष्टिकोणों अर्थात (।) विषयक डाटा ओवरले विश्लेषण तथा (II) मात्रात्मक मैट्रिक्स विश्लेषण का उपयोग किया ।
निर्माणीधीन परियोजनाएं
क्र.सं. |
योजना का शीर्षक |
पीआई के और संस्थान का नाम |
स्थिति |
1. |
2. |
3. |
|
1. |
पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में भूजल जलभृतों में आर्सेनिक संदूषण के प्रभाव और कारण तथा उपचारात्मक उपाय |
राज्य जल अन्वेषण निदेशालय, पश्चिम बंगाल सरकार |
कार्य पूरा किया गया । रिपोर्ट की प्रतीक्षा है । |
2. |
उड़ीसा के सहजात जल क्षेत्रों और कठोर शैल क्षेत्र इलाके में पंपिंग और विभिन्न ड्रा डाउन परिस्थिति में भूजल व्यवहार (विवरण के लिए यहाँ क्लिक करें) |
मुख्य अभियंता तथा निदेशक, डीजीडब्ल्यूएसएंडआई, जल संसाधन विभाग, उड़ीसा सरकार. उड़ीसा, भुवनेश्वर, और क्षेत्रीय निदेशक, केंद्रीय भूमि जल बोर्ड, द.पू.क्षेत्र भुवनेश्वर |
निर्माणाधीन |
3. |
वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और अपशिष्ट जल पुन: उपयोग पर अनुसंधान एवं विकास सह कार्रवाई जागरूकता परियोजना |
प्रो एस ए अब्बासी, पांडिचेरी विश्वविद्यालय, कलापेट, पांडिचेरी |
मोचन निषेध के लिए प्रस्तावित |
4. |
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली में नगर भूमि भराव के माध्यम से जल संदूषण पर अध्ययन भरता है । |
डॉ. अल रामनाथन, एसोसिएट प्रोफेसर, पर्यावरण विज्ञान के स्कूल, जेएनयू, नई दिल्ली. |
अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी गई है । |
5. |
संदूषित भूजल और इसके क्षेत्र से प्रयोगशाला अनुप्रयोग के लिए डीफलोराईडेशन मीडिया का विकास। |
डॉ. उदय चंद घोष रसायन विज्ञान विभाग, प्रेसीडेंसी कॉलेज, कोलकाता |
अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी गई है । |
6. |
दूर संवेदी (जीआईएस) का उपयोग कर उपरी गंगा मैदान में कृत्रिम पुनर्भरण के लिए साईटों की पहचान । |
डॉ. आरपी गुप्ता, पृथ्वी विज्ञान विभाग, आईआईटी, रुड़की, उत्तराखंड |
अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी गई है । |
7. |
सोलानी नदी बेसिन के बजाडा भूभाग में भूजल स्रोत क्षेत्रों की रूपरेखा के लिए फजी लॉजिक एवं जीआईएस के एकीकरण. |
श्री ओपी दुबे, क्षेत्रीय निदेशक, सिंचाई अनुसंधान संस्थान, रुड़की |
मोचन निषेध के लिए प्रस्तावित |
8. |
कृत्रिम तंत्रिका नेटवर्क के उपयोग से भूजल गुणवत्ता का स्पेटियो टैम्पोरल मॉडलिंग |
डा. के.पी. सुधीर, एसोसिएट प्रोफेसर, |
निर्माणाधीन |
9. |
शहरी क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन के प्रभाव का मूल्यांकन करने के लिए एक पद्धति का विकास |
डा. जी रवि कुमार, सहायक. सिविल इंजीनियरिंग में प्रो. कैमिकल इंजीनियरिंग विभाग, एसी टेक अन्ना विश्वविद्यालय, चेन्नई - 600,025 |
निर्माणाधीन |
10. |
तटीय वाटरशेड में झींगा खेती के जल रासायनिक प्रभावों का आकलन |
डॉ. नीला रेखा, वरिष्ठ वैज्ञानिक, सेंट्रल इंस्टिट्यूट ऑफ ब्रेकिश वाटर एक्वाकल्चर, चेन्नई |
निर्माणाधीन |
11. |
औद्योगिक उपयोग के लिए पेयजल स्वच्छीकरण एवं जल सुधार हेतु नैनोफिल्टरेशन मेम्बरेन का विकास |
डा. परमिता रे, वैज्ञानिक, केंद्रीय नमक और समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान, भावनगर, गुजरात |
निर्माणाधीन |
12. |
पांडिचेरी के जलभृतों में संवेदनशीलता मूल्यांकन और भूजल प्रबंधन अध्ययन |
डॉ. एस. चिदंबरम, एसोसिएट प्रोफेसर, भू - विज्ञान विभाग, अन्नामलाई विश्वविद्यालय |
निर्माणाधीन |