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केन्‍द्रीय भूमि जल बोर्ड

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अनुसंधान और विकास अध्ययन


जल संसाधन मंत्रालय के अनुसंधान एवं विकास कार्यक्रम:

जल संसाधन मंत्रालय जल संसाधन इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अनुसंधान कार्य को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करता है।  यह सहायता  विश्वविद्यालयों में शिक्षाविदों/ विशेषज्ञों,  आईआईटी, मान्यता प्राप्त अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशालाओं, केन्द्रीय और राज्य सरकारों और गैर सरकारी संगठनों के जल संसाधन/ सिंचाई विभागों के लिए अनुदान के माध्यम से प्रदान की जाती है । जल संसाधन मंत्रालय के समर्थन के लिए मौलिक अनुसंधान के साथ-साथ अनुप्रयुक्‍त  अनुसंधान प्रस्‍तावों पर विचार किया जाता है ।

भूजल संबंधी भारतीय राष्ट्रीय समिति (आईएनसीजीडब्‍ल्‍यू)

भू जल संबंधी भारतीय राष्ट्रीय समिति (आईएनसीजीडब्‍ल्‍यू) का गठन जल संसाधन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा भूजल क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास कार्यक्रमों में तेजी लाने के लिए और भूजल के क्षेत्र में अनुसंधान की बढ़ती आवश्‍यकता को ध्‍यान में रखकर किया गया है ।  अध्यक्ष, केन्द्रीय भूजल बोर्ड आईएनसीजीडब्‍ल्‍यू  के अध्यक्ष है। भू - जल के क्षेत्र में 15 प्रख्यात विशेषज्ञ इस समिति के सदस्‍य  है।  

समिति को निम्नलिखित कार्यों का दायित्‍व सौंपा गया है -

  विषय डोमेन:

अनुसंधान श्रेणियाँ

अनुसंधान और संबंधित गतिविधियों के लिए जल संसाधन मंत्रालय  से सहायता अनुदान की मांग हेतु निम्नलिखित सूची से एक या अधिक घटक होने चाहिएं ।

किसे वित्त पोषित किया जा सकता है
अनुदान निम्नलिखित को उपलब्ध कराया जाता है:

आवेदन प्रक्रिया

अनुसंधान अनुदान के लिए आवेदन करने के लिए जल संसाधन मंत्रालय के दिशा निर्देशों में निर्धारित प्रोफार्मा पर प्रोफार्मा पर आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है । प्रस्ताव की पांच प्रतियां नीचे दिए गए पते पर सदस्य सचिव, आईएनसीजीडब्‍ल्‍यू को प्रस्तुत किया जाना चाहिए:

सदस्य सचिव, आईएनसीजीडब्‍ल्‍यू
केंद्रीय भूमिजल बोर्ड
गैलरी नं 18/11, जाम नगर हाउस
मानसिंह रोड, नई दिल्ली - 110011

अनुसंधान अनुदान आवेदन प्रपत्र और विस्तरित दिशा - निर्देश के लिए ( यहाँ क्लिक करें)
अनुसंधान स्टाफ के वेतन की दरों के लिए (यहाँ क्लिक करें) 
ऐसे प्रस्ताव जो किसी भी नई तकनीक के अनुसंधान से संबंधित नहीं हैं, जो डेटा संग्रहण और डेटा के अभिज्ञात तकनीक उपयोग से संबंधित है, साइट विशिष्ट प्रस्तावों, जो प्रयोगशाला अध्ययन तक ही सीमित हैं और जिनमें क्षेत्र परीक्षण के लिए योजना शामिल नहीं की गई है, ऐसे प्रस्‍ताव  जहां नई तकनीक के अंतिम उपयोगकर्ता की स्पष्ट रूप से पहचान नहीं होती है कम प्राथमिकता दी जाएगी.


भूजल डोमेन में अनुसंधान की प्राथमिकता वाले क्षेत्र

 

 


पूरी हो चुकी परियोजनाएं


क्र.सं.

योजना का शीर्षक

पीआई के और संस्थान का नाम

स्थिति

1.

2.

3.

 

1.

पश्चिमी हिमालय में वसंत निर्वहन की वृद्धि के लिए
भूजलवैज्ञानिक अध्ययन

डॉ. जी.सी.एस.नेगी, हिमालय पर्यावरण एवं विकास, जीपी पंत संस्‍थान कोसी कटारमल, अल्मोड़ा

पूरी कर ली गई है।

2.

डाटा बेस तैयार करने और भूजल पुनर्भरण क्षमता के मूल्यांकन और नदी भूआकृति विज्ञान के लिए राजस्थान के खारी माशी जल निकासी बेसिन, का अध्ययन.

डॉ. एस सिन्हा रे, बिरला इंस्टिट्यूट ऑफ साइंटिफिक रिसर्च, स्‍टैचू सर्किल, जयपुर - 302,001, राजस्थान

पूरी कर ली गई है।

3.

मुजफ्फरनगर जिला, उत्तर प्रदेश के यमुना कृष्‍णा उपबेसिन में भूजल प्रवाह मॉडलिंग एवं जलभृत संवेदनशीलता  मूल्यांकन अध्ययन

डॉ. राशिद उमर, भूविज्ञान विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय.

पूरी कर ली गई है।

4.

भारत में भूजल के उपयोग को विनियमित करने के लिए संस्थागत ढांचा

प्रो कामता प्रसाद, अध्यक्ष, इंस्‍टीटयूट फॉर रिसार्स मैनेजमेंट एंड इकनोमिक डवलैपमेंट , 2 बी, इंस्टीट्यूशनल एरिया, कड़कड़डूमा, दिल्ली - 110 092.

पूरी कर ली गई है।

5.

जैब उपचार के उपयोग से सीआर (VI) संदूषित जलभृतों की सफाई हेतु मॉडल का विकास

 डॉ. लिगे फिलिप, एसोसिएट प्रोफेसर, सिविल इंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी मद्रास, चेन्नई – 600036.

पूरी कर ली गई है।

पूरी हो चुकी परियोजनाओं का सार

अध्‍येता ने पश्चिमी हिमालच (उत्‍तराखंड में ) मध्‍य ऊंचाई बेल्‍ट (निचले हिमालय) में 5 चुनिंदा झरनों की जल उत्‍पादकता एवं गुणवत्‍ता पर झरना पुनर्भरण क्षेत्र में वर्षा, भूआकृति विज्ञान, अश्‍म विज्ञान, ढ़लान एवं पहलू, भूमि उपयोग पद्धति, वनस्‍पति, ऊंचाई, मृदा के प्रकार तथा मानवजनित हस्‍ताक्षेपें (अर्थात सड़क निर्माण तथा स्‍थापन आदि) के प्रभाव को समझने का प्रयास किया है । इस बेल्‍ट में अधिकांश मानव स्‍थापना हो चुकी है तथा झरनों के जल का संवर्धन अत्‍यंत आवश्‍यक है । इस अनुसंधान द्वारा झरनों में निस्‍सरण एवं जल संवर्धन के लिए पुनर्भरण क्षेत्र विशिष्‍टताओं को आदर्श माना जाता है ।
( विस्तृत रिपोर्ट के लिए यहाँ क्लिक करें)

क्षमता मूल्यांकन - प्रो कामता प्रसाद, अध्यक्ष, इंस्‍टीटयूट फॉर रिसार्स मैनेजमेंट एंड इकनोमिक डवलैपमेंट , 2 बी, इंस्टीट्यूशनल एरिया, कड़कड़डूमा, दिल्ली - 110 092.

इस अध्‍ययन में अध्‍येता ने अति दोहित गंभीर एवं अर्द्धगंभीर क्षेत्रों में भूजल के उपयोग के विनियमन के लिए मौजूदा संस्‍थागत ढांचे की पर्याप्‍ता की जांच करने का प्रयास किया है ।  उन्‍होंने समाज के कमजोर वर्गों के लिए साम्‍य के आधार पर भूजल प्राप्ति की दिशा में भूजल विनियमन प्रणाली की प्रभावकारिता का मूल्‍यांकन किया है । लेखक ने 6 चुनिंदा राज्‍यों नामत: आंध्रप्रदेश, दिल्‍ली,गुजरात,पंजाब, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में गहन अध्‍ययन किया ।  प्रत्‍येक राज्‍य से एक जिला (दिल्‍ली में 2 जिले) चुना गया । प्रत्‍येक जिले से 2 ब्‍लॉक (दिल्‍ली में एक ब्‍लॉक) तथा प्रत्‍येक ब्‍लॉक से 3 गॉंव और एक छोटे शहर को चुना गया । प्रत्‍येक नमूना गॉंव से 10 भूजल उपयोक्‍ता घर तथा प्रत्‍येक शहर से 15 भूजल उपयोक्‍ता घर (उपलब्‍धता के आधार पर) अध्‍ययन के लिए चुने गए। अध्‍ययन की सूचना जमीनी स्‍तर पर फील्‍ड सर्वेक्षण के माध्‍यम से प्राथमिक स्रोत पर अधिक निर्भरता रखते हुए प्राथमिक एवं माध्‍यमिक स्रातों से संग्रहित की गई । इन अध्‍ययन का यह सुझाव है कि गिरते भूजल स्‍तर जैसे जटिल मामले के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्‍यकता है । अध्‍ययन द्वारा कई कार्रवाई बिन्‍दुओं का सुझाव दिया गया है :
( विस्तृत रिपोर्ट के लिए यहाँ क्लिक करें)

इस अध्‍ययन का उद्देश्‍य यमुना कृष्‍णा उपबेसिन में प्रवाह प्रणाली की प्राकृतिक स्थिति के अंतर्गत जलभृत के जल संतुलन के विकास एवं सुधार तथा संदूषक संवेदनशील जलभृत क्षेत्र की पहचान करने और इसके उपशमन हेतु व्‍यवहार्यता अध्‍ययन करना है ।  इस अध्‍ययन द्वारा क्षेत्र की भूजल स्थिति की विस्‍तृत जानकारी निश्चितता के साथ प्रस्‍तुत की गई है । अध्‍येता का सुझाव है कि यमुना कृष्‍णा उपबेसिन में भूजल संसाधनों के प्रबंधन के लिए भूजल संरचनाओं पर सख्‍त नियंत्रण रखने की आवश्‍यकता है । अध्‍येता ने नियंत्रित संरचना, कृत्रिम पुनर्भरण, गहरे जलभृतों का विकास, भूजल कानून, संयुक्‍त उपयोग आदि का सुझाव दिया है ।
( विस्तृत रिपोर्ट के लिए यहाँ क्लिक करें)

इस अध्‍ययन के द्वारा जैब अवरोधों और प्रतिक्रियाशील क्षेत्रों सहित बैच प्रयोगों, बैंच स्‍केल कॉलम अध्‍ययन, प्रायोगिक स्‍केल अध्‍ययन के माध्‍यम से जलभृतों में हेम्‍सावेंलेंट क्रोमियम के परिवहन एवं जैब रूपांतरण को समझने का प्रयास किया गया है ।  बैच प्रयोग से प्राप्‍त डेटा को गुण और जीवाणु की उपस्थिति सीआर (VI) से सीआर (III) के जैब रूपांतरण के दौरान सीआर (VI) अल्‍पीकरण, सबस्‍ट्रेट खपत एवं जीवाणु वृद्धि की प्रक्रिया का अनुकरण करने के लिए एक गणितीय मॉडल प्रस्‍तावित करने के लिए उपयोग में लाया गया । इस मॉडल का विकास न केवल क्रोमिकयम अल्‍पीकरण जीवाणु (सीआरबी) द्वारा जैव रूपांतरण मात्र के लिए किया गया बल्कि गड़, लौह एवं सल्‍फेट की उपस्थिति में सीआरबी, लौह अल्‍पीकरण जीवाणु (आईआरबी) और सल्‍फेट अल्‍पीकरण जीवाणु (एसआरबी) द्वारा सीआर (VI) से सीआर (III) के जैब रूपांतरण के लिए भी किया गया । गणितीय मॉडल को प्रायोगिक स्‍केल प्रयोग अध्‍ययन द्वारा मान्‍यता दी गई ।  यह प्रदर्शन किया गया कि जैब बैरियर्स के इष्‍टतम डिजाइन के लिए प्रस्‍तावित गणितीय मॉडल कैसे अनुकार अनूकलन ढांचे में इष्‍टतम मॉडल से जोड़ेजा सकते हैं ।  गणितीय मॉडलों को संदूषिज जलभृतों के उपचार हेतु प्रतिक्रिया क्षेत्र प्रौद्योगिकी की व्‍यवहार्यता अध्‍ययन के लिए भी प्रयोग में लाया गया ।

( विस्तृत रिपोर्ट के लिए यहाँ क्लिक करें)

खारी माशी जल निकासी बेसिन में नदी संबंधी प्रक्रियाओं की भूमिका एवं उनकी संभावित योगदान को समझने के उद्देश्‍य से अध्‍येता द्वारा विभिन्‍न भूआकृति इकाईयों एवं धारा नेटवर्क विशेषताओं में इनकी प्रक्रिया का अध्‍ययन करने का एक प्रयास किया गया है । यह अध्‍ययन बेसिन में भूजल पुनर्भरण संभाव्‍यता एवं उपयुक्‍त पुनर्भरण क्षेत्र के रेखांकन के आकलन से संबंधित है । लेखक ने सबसे अनुकूल एवं संभाव्‍य भूजल पुनर्भरण क्षेत्र की पहचान करने के लिए दो द‍ृष्टिकोणों अर्थात (।) विषयक डाटा ओवरले विश्‍लेषण तथा (II) मात्रात्‍मक मैट्रिक्‍स विश्‍लेषण का उपयोग किया ।

निर्माणीधीन परियोजनाएं

 

क्र.सं.

योजना का शीर्षक

पीआई के और संस्थान का नाम

स्थिति

1.

2.

3.

 

1.   

पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में भूजल जलभृतों में  आर्सेनिक संदूषण के प्रभाव और कारण तथा उपचारात्मक उपाय

राज्य जल अन्‍वेषण निदेशालय, पश्चिम बंगाल सरकार

कार्य पूरा किया गया ।  रिपोर्ट की प्रतीक्षा है ।    

2.

उड़ीसा के सहजात जल क्षेत्रों और कठोर शैल क्षेत्र इलाके में पंपिंग और विभिन्‍न  ड्रा डाउन परिस्थिति में भूजल व्‍यवहार (विवरण के लिए यहाँ क्लिक करें)

मुख्य अभियंता तथा निदेशक, डीजीडब्‍ल्‍यूएसएंडआई, जल संसाधन विभाग, उड़ीसा सरकार. उड़ीसा, भुवनेश्वर, और क्षेत्रीय निदेशक, केंद्रीय भूमि जल बोर्ड, द.पू.क्षेत्र भुवनेश्वर

निर्माणाधीन

3.

वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और अपशिष्ट जल पुन: उपयोग पर अनुसंधान एवं विकास सह कार्रवाई जागरूकता परियोजना

प्रो एस ए अब्बासी, पांडिचेरी विश्वविद्यालय, कलापेट, पांडिचेरी

मोचन निषेध के लिए प्रस्‍तावित

4.

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली में नगर भूमि भराव के   माध्यम से जल संदूषण पर अध्ययन भरता है ।

डॉ. अल रामनाथन, एसोसिएट प्रोफेसर, पर्यावरण विज्ञान के स्कूल, जेएनयू, नई दिल्ली.

अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी गई है ।

5.

संदूषित भूजल और इसके क्षेत्र से प्रयोगशाला अनुप्रयोग के लिए डीफलोराईडेशन मीडिया का विकास।

डॉ. उदय चंद घोष रसायन विज्ञान विभाग, प्रेसीडेंसी कॉलेज, कोलकाता

अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी गई है ।

6.

दूर संवेदी (जीआईएस) का उपयोग कर उपरी गंगा मैदान में कृत्रिम पुनर्भरण के लिए साईटों की पहचान ।

डॉ. आरपी गुप्ता, पृथ्वी विज्ञान विभाग, आईआईटी, रुड़की, उत्तराखंड

अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी गई है ।

7.

 सोलानी नदी बेसिन के बजाडा  भूभाग में भूजल स्रोत क्षेत्रों की रूपरेखा के लिए फजी लॉजिक एवं जीआईएस के एकीकरण.

श्री ओपी दुबे, क्षेत्रीय निदेशक, सिंचाई अनुसंधान संस्थान, रुड़की

मोचन निषेध के लिए प्रस्तावित

8.

 कृत्रिम तंत्रिका नेटवर्क के उपयोग से भूजल  गुणवत्ता का  स्‍पेटियो टैम्‍पोरल मॉडलिंग
(विवरण के लिए यहाँ क्लिक करें)

डा. के.पी. सुधीर, एसोसिएट प्रोफेसर,
सिविल इंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी मद्रास, चेन्नई. 600,036

निर्माणाधीन

9.

शहरी क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन के प्रभाव का मूल्यांकन करने के लिए एक पद्धति का विकास
(विवरण के लिए यहाँ क्लिक करें)

डा. जी रवि कुमार, सहायक. सिविल इंजीनियरिंग में प्रो. कैमिकल इंजीनियरिंग विभाग, एसी टेक अन्ना विश्वविद्यालय, चेन्नई - 600,025 

निर्माणाधीन

10.

तटीय वाटरशेड में झींगा खेती के जल रासायनिक  प्रभावों का  आकलन
(विवरण के लिए यहाँ क्लिक करें)

डॉ. नीला रेखा, वरिष्ठ वैज्ञानिक, सेंट्रल इंस्टिट्यूट ऑफ ब्रेकिश वाटर एक्वाकल्चर, चेन्नई

निर्माणाधीन

11.

औद्योगिक उपयोग के लिए पेयजल स्‍वच्‍छीकरण एवं जल सुधार हेतु  नैनोफिल्‍टरेशन   मेम्‍बरेन का विकास
(विवरण के लिए यहाँ क्लिक करें)

डा. परमिता रे, वैज्ञानिक, केंद्रीय नमक और समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान, भावनगर, गुजरात

निर्माणाधीन

12.

पांडिचेरी के जलभृतों में संवेदनशीलता मूल्‍यांकन और  भूजल प्रबंधन अध्ययन
(विवरण के लिए यहाँ क्लिक करें)

डॉ. एस. चिदंबरम, एसोसिएट प्रोफेसर, भू - विज्ञान विभाग, अन्नामलाई विश्वविद्यालय

निर्माणाधीन